पटना में आयोजित रोजगार मेला एक बार फिर से युवाओं की उम्मीदों पर पानी फेरता नजर आ रहा है। ज्ञान भवन में हो रहे इस मेले में करीब 112 कंपनियां शामिल हुईं, लेकिन बिहार की मात्र 6 कंपनियों का होना स्थानीय रोजगार के अवसरों पर सवाल खड़ा करता है। यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या सरकार सच में स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन करने के लिए गंभीर है?रोजगार मेले में आए युवाओं की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि वे बेहतर वेतन और स्थाई नौकरी की उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन यहाँ उन्हें जो ऑफर मिल रहे हैं, वह महज 10 से 16 हजार के बीच हैं। इसके साथ ही इन्हें बाहर जाकर काम करने के लिए कहा जा रहा है, जिससे परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो रहा है।नौकरी या मजदूरी?पटना के मुन्ना की बात करें तो उन्होंने कहा, 'यहाँ नौकरी तो दी जा रही है, लेकिन इतना वेतन कैसे चल सकेगा?' युवा तकनीकी और बेहतर अवसरों की तलाश में आए थे, लेकिन अधिकांश ऑफर सामान्य मजदूरी, सेल्स और डिलीवरी से जुड़े थे। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि बिहार में रोजगार सृजन के लिए कंपनियों का प्रयास उचित नहीं दिखता।
  • अधिकांश कंपनियां युवाओं को दूसरे राज्यों में नौकरी का प्रस्ताव दे रही हैं।
  • कार्य के लिए दिए जा रहे वेतन में परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल है।
  • कई युवाओं ने आरोप लगाया कि ये मेले सिर्फ बायोडाटा संग्रहण के लिए आयोजित हो रहे हैं।
कई युवा नौकरी के लिए अपनी उम्मीदें लेकर आए थे, लेकिन उन्हें उस अनुरूप अवसर नहीं मिले। कुछ युवाओं ने शिकायत की कि कंपनियाँ केवल जानकारी जुटा रही हैं और असली नौकरी के लिए कोई ठोस वादा नहीं किया जा रहा है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है, जो यह दर्शाता है कि कहीं हम एक बड़ी समस्या का सामना तो नहीं कर रहे हैं।दिव्यांग युवाओं के लिए भी स्थिति और भी कठिन है। उन्होंने कहा कि उन्हें हमेशा दूसरे राज्यों में नौकरी करने के लिए कहा जाता है, जो उनके लिए संभव नहीं है। इस तरह की स्थिति सरकार की योजनाओं और नीतियों पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।आखिरकार, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह बिहार के युवाओं के लिए स्थायी और न्यायसंगत रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए। अगर सरकार सच में रोजगार मेले का आयोजन कर रही है, तो उसे स्थानीय कंपनियों को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि युवा अपने ही राज्य में काम कर सकें और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकें।